Showing posts with label उन्नत किसान. Show all posts
Showing posts with label उन्नत किसान. Show all posts

Wednesday, January 31, 2018

गाजर की खेती से यहा कमाते है किसान 3 महीने में 2 करोड़ रुपये



आमतौर पर हमारे देश के किसान ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि गाजर की खेती से मात्र तीन माह में दो करोड़ रुपए की कमाई कर सकते है। लेकिन अब ऐसा हो रहा है। भरतपुर के एक गांव इंद्रोली मे। इस गांव के किसानों को जब लुपिन फाउण्डेशन ने उच्च गुणवत्तायुक्त बीज देने के साथ ही खेती करने की तकनीक और अच्छे बाजार की जानकारी दी तो उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से इस सपने को हकीकत में तब्दील करदिया। आज इंद्रोली गांव की स्थिति यह है कि इस गांव से प्रतिदिन करीब 100 कुंतल गाजर नई दिल्ली, गुडग़ांव अथवा आस-पास की मंडियों में विक्रय के लिए भेजी जाती हैं।



इन्द्रोली गांव की जमीन रेतीली एवं उपजाऊ होने के साथ ही यहा सिंचाई के लिए भरपूर मीठा पानी उपलब्ध है। जो गाजर के अच्छे उत्पादन सहायक है। इसी वजह से यहा के किसानों को गाजर की बम्पर पैदावार मिलती है। इसके साथ ही इस गांव के किसान अपनी गाजर की फसल को उच्च मूल्य पर बेचने के लिए इसकी बुवाई अगस्त माह में ही कर देते हैं। और इन किसानों की गाजर की फसल अक्टूबर माह मे ही बाजार में आना शुरू हो जाती है जिससे किसानों को इस फसल का कई गुना अधिक मूल्य मिलता है।

जीवामृत उत्पादन बढ़ाने के साथ ही भूमि की उर्वराशक्ति भी बढ़ा रहा है।


इन्द्रोली गांव में लगभग 250 बीघा भूमि में गाजर की फसल उगाई जाती है। जिसके लिए पांच-छह बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है और गाजर की खुदाई के बाद इसकी धुलाई के लिए जो मजदूरो पर खर्च होता था उसे कम करने के लिए किसानों ने गजर की धुलाई के लिए दो धुलाई मशीनें खरीद खरीदी है। इन मशीनों की सहायता से किसान मात्र एक घण्टे में करीब 20 क्विंटल गाजरों की धुलाई कर लेते हैं।

अब नाम से बिकती हैं गाजर

इंद्रोली के किसानों को लुपिन फाउण्डेशन ने अधिक उत्पादन देने वाले गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध कराए। और किसानों ने भी खूब मेहनत की जिसके कारण आज इन्द्रोली की गाजर पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गई। आब स्थिति यह है कि कोसी अथवा होडल की सब्जी मण्डियों में इन्द्रोली की गाजर दाम से नहीं अब तो नाम से बिकती है और रेट भी अधिक मिलता हैं। इन्द्रोली गांव के किसानों को समय-समय पर गाजर की फसलों में लगने वाले रोगों की रोकथाम के अलावा फसल क्रिया की भी लुपिन फाउण्डेशन के विषय-विशेषज्ञों द्वारा जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। अगेती गाजर की बुवाई करने वाले किसान इसकी फसल लेने के बाद गेहूं की बुवाई कर देते हैं जबकि पछेती बुवाई करने वाले किसान गाजर की फसल के बाद मूंग अथवा अन्य दलहनी फसलों की बुवाई करते हैं जिसके कारण इनकी आय में और वृद्धि हो जाती है।


ये भी पढ़े

किसान इस प्रकार करे गाजर की उन्नत खेती मिलेगा अधिक उत्पादन

पालक की उन्नत खेती से किसान लाखो मे कर रहे है कमाई

ब्रोक्ली की खेती बढ़ा रही है किसानों की आय
Share:

Thursday, January 4, 2018

पारम्परिक खेती छोड़ अपनाई फूलो की खेती तो 40 लाख की होने लगी कमाई



जहा एक तरफ हमारे किसान भाई खेती से होने वाली आय को लेकर काफी परेशान है और कर्ज में डूबते जा रहे है वही कुछ उन्नत किसान ऐसे हालात में भी उम्मीद की एक किरण है। जो किसानों को हिम्मत और कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते है। ऐसे ही एक उन्नत किसान है खेडी मल्लाह गांव के रहने वाले किसान हरबंस सिंह। उन्नत किसान हरबंस सिंह ने 1999 में ही पारंपरिक खेती को छोड़कर फूलों की खेती अपनाई
और आज हरबंससिंह की आंखों में सफलता की चमक आसानी से देखी जा सकती है। करीब 10 एकड़ में फूलों की आधुनिक खेती करने वाले उन्नत किसान हरबंस सिंह कहते हैं कि उन्होंने ग्रैजुएशन तक पढ़ाई की लेकिन इसके बावजूद भी वह दूसरों की तरह सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भागे। बल्कि उन्होंने अपने पारिवारिक पेशे को ही चुनाऔर आज सालाना 40 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं।



हरबंस सिंह के पिता हाकम सिंह भी अपने बेटे की इस सफलता से खुश हैं। हाकिम सिंह बताते हैं कि किस तरह से शुरूआती दो-तीन सालो में उन्हें कई मुश्किलो का सामना भी करना पड़ा। लेकिन उनके पुत्र ने हिम्मत नही हरि और अब सबकुछ ठीक है। वह बताते है कि पांच एकड़ जमीन उनकी अपनी पुश्तेनी जमीन है और पांच एकड़ जमीन उन्होंने ठेके पर ले रखी है। जिस पर फूलो की खेती की जाती है। वह अपने खेतों मे फूलों की अलग-अलगकिस्में जैसे मैरी गोल्ड , जाफरी, गुलदाउदी आदि की खेती करते हैं। जिनकी मांग बाजार मे बनी रहती है।

विदेशी पौधों की सप्लाई ने बना दिया करोड़पति। किसान भी इनका बाग लगाकर करसकते है अधिक कमाई

ढाई लाख की नौकरी छोड़ शुरू की खेती।आज है एक करोड़ का टर्नओवर

हरबंस सिंह बताते है कि पहले वह पारम्परिक खेती ही करते थे। जिसमें गेहूं और धान की फसल उगाई जाती थी। इस पारम्परिक खेती से उन्हें 5 लाख रुपए ही प्राप्त होते थे। लेकिन फूलो फसल से अब उनको अच्छी आमदनी हो रही है।

हरबंस सिंह ने बताया कि पहले पेशेवर खेती से कमाई कुछ खास नहीं हो रही थी। फिर उन्होंने समय के साथ-साथ नई तकनीकों को अपनाने के बारे में विचार किया। और इसी विचार से नई तकनीकों को अपनाते हुए उन्होंने फूलों की खेती की शुरुआत की और आज एक सफल किसान के रूप में हमारे सामने है।
हरबंस सिंह कहते है कि खेती में खर्चे बहुत बढ़ गए हैं। इसलिए आमदनी का भी उसी अनुपात मे बढ़ाना  जरूरी था। और यह तभी संभव हो सका जब पारंपरिक खेती को छोड़कर नई तकनीक अपनाई गयी।

वर्मीकम्पोस्ट भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ ही उत्पादन में भी कर रहा है व्रद्धि

जीवामृत फसलो के लिए साबित हो रहा है वरदान।जाने घर पर ही कैसे करे तैयार

हरबंस ने कुछ परेशानियों के बारे में बताते हुए कहा कि दो साल से फूलों की खेती करने वाले किसानों को जो सब्सिडी सरकार देती थी अब वह बंद हो गई है। जिससे फूलो की खेती करने वाले किसानों पर इसका बुरा असर पड़ा है। अगर सरकार आर्थिक मदद देना फिर शुरू करदे तो दूसरे किसान भी फूलों की खेती की तरफ आकर्षित होंगे। तथा फूलों की खेती से पंजाब के पानी की बचत के साथ साथ बिजली की भी बचत होगी। इस खेती पर मौसम का प्रभाव भी कम रहता है।
खेतीबाड़ी विभाग से प्रगति शील खेती के लिए सम्मानित हो चुके हाकम सिंह ने कहा कि उनके अलावा भी यहा के कई दूसरे किसान जन्मे भरपूर सिंह, बलबीर सिंह, महिंदर सिंह, परगट सिंह तथा जसवीर सिंह आदि भी फूलों की खेती करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। उन्होंने पंजाब सरकार से पटियाला में ही फूलों की मंडी स्थापित करने की अपील की, ताकि यहां के किसानों को फूल बेचने के लिए लुधियाना या दिल्ली
जाने की ज़रूरत न पड़े।

यह भी पढ़े

पालक की खेती से किसान कर रहे है लाखो मे कमाई। जाने कैसे करे खेती?

आलू की उन्नत खेती से मिल रहा है किसानों को बम्पर उत्पादन

मिर्च की उन्नत खेती बढ़ाएगी किसानों की आय
Share:

Thursday, December 21, 2017

सफेद मूसली की खेती ने किसान को किया मालामाल



प्रिय पाठकों जैसा कि हम सब जानते है कि फसलो की कम पैदावार और उस पर खर्च अधिक होने से हमारे किसान भाई कर्ज में डूबे हुए है। जिस कारण किसानों की आत्महत्त्या करने की दर में भी लगातार व्रद्धि हो रही है। ऐसी भयावह स्तिथि मे प्रगतिशील किसान उम्मीद की एक किरण बनकर हताश लोगो मे नई जान डाल रहे है। ऐसे ही प्रगतिशील किसानो मे से एक हे जयपुर के कोल्यारी तहसील झाड़ोल के निवासी नानालाल शर्मा जी।



नानालाल शर्मा भी पहले एक सामान्य किसान की तरह गेहूं, मक्का, उड़द और सरसों आदि की खेती किया करते थे।लेकिन इस पारम्परिक खेती मे अधिक खर्च और कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिलपाता था। वे भी अपनी फसल के अच्छे दाम न मिलने से निराश ही होते थे। फिर एक बार उन्होंने कथौड़ी समाज के कुछ लोगों को जंगलो से सफेद मूसली लाकर बाजार मे बेचते हुए देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने इस सफेद मूसली का भाव पता किया। तभी उनके मन में भी सफेद मूसली की खेती करने की बात आई।
नानालाल शर्मा ने जुलाई 2001 में धरावण के जंगल से सफेद मूसली के करीब 5000 पौधे लाकर अपने खेत में लगाए। जब ये पौधे बड़े हुए तो उन्हीं पौधों से तैयार जड़ों को उन्होंने दोबारा 2002 में अपने खेत में लगादी। इन जड़ो की बुआई के चौथे दिन ही इनमे अंकुरण शुरू हो गया। इन पौधों पर एक माह के बाद सफेद फूल आगये। फिर सितम्बर 2002 में नानालाल शर्मा की मेहनत रंग लाई और उन्हें उनके खेत से सफेद मूसली की बम्पर फसल प्राप्त हुई। इस प्रक्रिया में कृषि विभाग पूर्ण रूप से मार्गदर्शक के रूप में उनके साथ रहा। कथौड़ियों से जानकारी लेकर सफेद मूसली को सुखा लिया।इसके बाद वे इसे बेचने लगे। इस वर्ष उन्हें आधे बीघा भूमि में करीब 80,000 रुपए का लाभ हुआ। इसे देखकर अन्य किसान भी सफेद मूसली का बीज ले जाकर खेती करने लग गए। सफेद मूसली का उत्पादन बोए गए बीज की मात्रा का पंद्रह गुणा तक प्राप्त होता है।

सफेद मूसली का छिलका उतारते हुए नानालाल शर्मा के मन में आया कि सूखी मूसली बेचने के बजाय अगर पाउडर बनाकर बेचा जाए तो और भी अधिक लाभ होगा। शर्मा ने इसका पाउडर बनाकर बेचा। लोगों ने इस पाउडर को भी खरीदा, लेकिन उन्हें इसके उपयोग में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी।

विदेशी पौधो की सप्लाई ने बना दिया करोड़पति, किसान इनका बाग लगाकर कर सकते है अधिक कमाई

किसान विनोद सिंह केले की नर्सरी से 30 दिन मे कमाते है 5 लाख

इसमे चिकनाहट होने के कारण इसे खाने या दूध के साथ लेने में थोड़ी दिक्कत होती थी। एक उपयोगकर्ता ने जब इसकी शिकायत शर्मा से की तो शर्मा ने दूसरा तरीका अपनाया और सफेद मूसली पाउडर के केप्सूल बनाने का कार्य शुरू किया। वर्तमान में शर्मा सफेद मूसली के 1.50 से 2 लाख केप्सूल बनाकर 2 प्रति केप्सूल की दर से प्रति वर्ष बेच रहे हैं। साथ ही बीज भी बेच रहे हैं, इससे उन्हें 4 लाख से अधिक की आय हो रही है। शर्मा का मानना है कि झाड़ोल फलासिया में सफेद मूसली की खेती प्रति वर्ष 100 करोड़ से पार जा सकती है।
शर्मा को उम्मीद है कि वर्तमान में झाड़ोल तहसील जिला-उदयपुर के कोल्यारी, धरावण, जेतावाड़ा, सीगरी, मैसांणा, ओड़ा, धोबावाड़ा, तलाई आदि गांवों में 3500 किसानों से बढ़ाकर 15000 से अधिक किसान इसकी खेती प्रारम्भ करें। सफेद मूसली की खेती को कोटड़ा तक फैलाना, क्षेत्रफल बढ़ाना, साथ ही एक प्रसंस्करण यूनिट स्थापित करवाना भी उनका सपना है।

पालक की खेती करके किसान भाई लाखो मे कर सकते है कमाई

इस प्रसंस्करण यूनिट के माध्यम से सफेद मूसली केप्सूल और इसके पाउडर की अच्छी तरह पैकिंग कर बाजार में बेच जा सकेगा तथा किसानों की उत्पादन व मार्केटिंग कम्पनी बनाकर इसके निर्यात का रास्ता तैयार हो सकेगा। उदयपुर में आयोजित होने वाले ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (ग्राम उदयपुर) के दौरान मूसली के मूल्यवर्धित उत्पादों का भी प्रदर्शन किया जाएगा।

ये भी पढ़े

मात्र 20 रुपये के वेस्ट डीकम्पोज़र से फसल की पैदावार बढ़ा सकते है किसान

गाजर की उन्नत खेती कैसे करे?

आधुनिक तरीके से करे आलू की खेती मिलेगा अधिक लाभ

Share:

Tuesday, August 16, 2016

विदेशी पौधो की सप्लाई ने बना दिया करोडपति,किसान इनका बाग लगाकर करसकते हे अधिक कमाई



राजस्थान के तरंजन चौधरी ने अपनी महनत और लगन से बाड़मेर राजस्थन के रेतीले इलाकों में उन फलों को उगाया है जो पहले सिर्फ विदेशी जमीन पर उगते थे।
तरंजन चौधरी की बदौलत बाड़मेर आज इन पौधों की नर्सरी का हब बन चुका है। तरंजन विदेशों से इन पौधों को लाकर देश के कई अन्नय राज्यों में किसानों को दे रहे हैं।कई पौधों के तो वो भारत में अकेले सप्लायर हैं। इससे तरंजन को तो सालाना करोड़ों की आमदनी होती ही है।साथ देश के किसान भी विदेशी फलो के पौधे लगाकर लाखो कमा रहे है।


तरंजन चौधरी राजस्थान के बाड़मेर जिले के रहने वाले है।
तरंजन ने छह साल पहले एक खबर में विदेशों मे पौधारोपण की कई नयी किस्मों के बारे में पढ़ा, जिसमे उन्होंने थाई एप्पल बेर, ग्राफ्टेड चीकू, ग्राफ्टेड आम, अंजीर, पिस्ता, थाई अमरुद, बिना बीज नींबू, गुग्गल, ड्रैगन, अनार, कलमी गुन्दा, हाइब्रिड शीशम, एस मोगी, दिव्य चन्दन की तमाम नयी किस्मों के बारे में जाना।

किसान विनोद सिंह केले की नर्सरी से 30 दिन में कमाते हैं 5 लाख। Kisan Help Room

किसान कम लागत मे घर पर ही तैयार करे अच्छी किस्म की वर्मी कम्पोस्ट। जाने कैसे?

सफेद मूसली की खेती ने किसान को किया मालामाल

ये नयी किस्में उनके अपने ही शहर में पैदा हों इसके लिए उन्होंने कई संस्थानों में जाकर प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। तरंजन चौधरी बताते हैं, विदेशों में उगने वाले पौधों की बागवानी से अच्छी कमाई तो हो सकती थी, लेकिन हमारे लिये ये जानना जरुरी था कि हमारे देश की जलवायु में ये पौधे पनपेंगे या नहीं? इसलिए हमने 2010 में देश के 120 इलाकों की मिट्टी, बारिश और समुद्र के पानी के सैंपल की जांच कराई। जांच बाद हमें पता चला कि ये फल हमारे देश की जलवायू में पैदा हो सकते हैं।"
वो आगे बताते हैं, सैंपल के तौर पर हमने कुछ पौधे इजराइल,थाईलैंड, कैलोफोर्नियाँ से मंगाना शुरू कर दिया, प्रयोग सफल रहा तो फिर इसी काम को शुरु कर दिया। अब मैं नर्सरी का स्टॉक करता हूं, विदेशों से पौधे मंगवाता हूं और उन्हें देश के कोने-कोने में किसानों को भेजता हूं।"
तरंजन चौधरी द्वरा लाई गयी इन नयी प्राजातियों में एक प्रजाति एप्पल बेर की है, जिसे इस वक्त लगाया जा सकता है। थाईलैंड के इस पौधे को जून से लेकर दिसंबर तक कभी भी लगाया जा सकता हैं। राजस्थान में इस समय एप्पल बेर की खेती लगभग 500 हेक्टेयर भूमि पर हो रही है। एप्पल बेर का पौधा -5 डिग्री से 55 डिग्री तक का तापमान सहन करने की क्षमता रखता है।
तरंजन बताते हैं, एक बार एप्पल बेर लगाने के बाद पचास साल तक इससे आमदनी की जा सकती है। खेत में पौधा लगाने के 14 महीने बाद पौधे पर फल आने शुरू हो जाते हैं। पहले साल थोड़ा कम पैदावार होती है लेकिन दूसरी और तीसरी साल से पैदावार मे बढोतरी होने के साथ किसान लाखों रुपए सालाना  कमा सकते हैं।
उत्तरप्रदेश में एप्पल बेर की खेती के बारे में पूछने पर तरंजन सिंह के भाई घेवर सिंह बताते हैं कि बाग लगाई जा सकती है लेकिन खर्च थोड़ी ज्यादा आता है। अगर राजस्थान में एक बीघे में 20 हजार का खर्च आता है तो यूपी में 50 हजार खर्च आएगा।  इस बाग से पहले साल 30 हजार,दूसरे और तीसरे साल में दो से ढाई लाख का मुनाफा हो सकता है।

जीवामृत है खेती के लिए वरदान,जाने कैसे प्रयोग करे

ढाई लाख की नौकरी छोड़कर शुरू की खेती आज है एक करोड़ का टर्न ओवर

फलदार पौधों के साथ-साथ तरंजन फर्नीचर में इस्तेमाल होने वाले पौधे भी विदेशो से मंगाने लगे हैं। पेशे से कंप्यूटर शिक्षक उनके भाई घेवर सिंह राजपुरोहित भी इसी पेशे में हाथ आजमा रहे हैं। घेवर सिंह बताते हैं कि भारत में पहली बार कैलीफोर्निया और थाई लैब द्वारा तैयार एन्टीडिजीज,एन्टीक्लाईमेट, हाईब्रिड किस्म, टिश्यू कल्चर, ग्राफ्टेड और उच्च तकनीक से तैयार फलों एवं इमारती लकड़ी के पौधों की नर्सरी तैयार की है। वो अपनी नर्सरी के इन पौधों को महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्प्रदेश और दिल्ली भेजते हैं। 
कैसे लगाएं एप्पल बेर का बाग
जून के महीने से लेकर दिसम्बर महीने तक खेत में एप्पल बेर किसी भी समय लगाया जा सकता हैं। 15/13 के हिसाब से गढ्ढे से गढ्ढे की दूरी,2/2 का गढ्ढा खोदना हैं। 8-10 दिन तक इसे खुला छोड़ने के बाद इसमे एप्पल बेर के पौधे लगा सकते हैं। एक बीघे में 100 पौधे लगाये जा सकते हैं। एक पौधे की कीमत 140 रुपये है। पौधे को पानी और खाद आदि देने के लिए टिप्स तरंजन की टीम आजीवन किसानों को देगी। थाई एप्पल बेर में कांटे नहीं होते हैं। इसमें 11 से 14वें महीने में उत्पादन शुरू हो जाता है। सेब जैसे स्वाद वाले इस फल का वजन 100 ग्राम तक होता है। महाराष्ट्र में इस फल की औसत कीमत 40-45 रुपये प्रति किलो है।

पालक की खेती से किसान कमा रहे है लाखो।जाने कैसे करे खेती?

वैज्ञानिक तरीके से गाजर की उन्नत खेती कैसे करे? Kisan Help Room

वैज्ञानिक तरीके से करेले की उन्नत खेती करके अधिक लाभ कमा सकते हैं किसान भाई। Kisan Help Room

पॉलीहाउस,ग्रीनहाउस या हरितगृह किसे कहते है? ग्रीन हाउस में आधुनिक खेती हे मुनाफे का सौदा

Share:

Monday, August 8, 2016

किसान विनोद सिंह केले की नर्सरी से 30 दिन मे कमाते है 5 लाख: Kisan Help Room



जहॉ एक तरफ हर कोई खेती को घाटे का सौदा बताता है। किसान भाई अधिक लागत लगाकर भी फसल से अच्छा लाभ नही ले पारहे है वही एक किसान केले की नर्सरी से महीने मे ही लाखो कमा रहा है। हम बात कर रहे हे किसान विनोद सिंह की।  
केले की नर्सरी का काम उत्तर प्रदेश के लखनऊ  इटौंजा, गोरखपुर के बाद अब कौशाम्बी में भी शुरू हो गया है। केले की नर्सरी से अच्छी कमाई को देखते हुए अब यहा के किसानो केले की नर्सरी ने अपनी ओर आकर्षित किया है। और यहा के कई किसान अब इसकी खेती करने लगे है।

ढाई लाख की नौकरी छोड कर शुरू की खेती, आज हे एक करोड का टर्न ओवर

केले की नर्सरी को तैयार करने में लगभग 25 से 30 दिन का समय लगता है, समय कम लगने के साथ-साथ इससे अच्छी कमाई की जा सकती है|
कौशाम्बी जिले से 25 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण दिशा में पचामा नाम का एक गाँव है। इस गाँव के रहने वाले किसान विनोद सिंह (38 वर्ष) बताते हैं कि “2015 में मैंने केले की नर्सरी लगाना शुरू किया था। मुझे नर्सरी की खेती से अच्छा लाभ मिला। इस बार मैने 25-30 दिन में केले की नर्सरी से पांच लाख रुपए कमाए है।"
खेती एक घाटे का सौदा है ये समस्या हमारे यहां के हजारों किसानों की है। लेकिन विनोद ने इस समस्या को हल करने के लिए कई जगहो से खेती से सम्बंधित ट्रेनिंग ली और वर्ष 2010 से खेती करना शुरू किया।

शुरूआत मे उन्हे कई परेशानियो का सामना भी करना पडा लेकिन वो अपनी मेहनत और सूज बूझ से आगे बढते रहे।
खेती को सही ढंग से करने के लिए उन्हे तीन से चार साल का समय लगा और आज विनोद सिंह एक सफल किसान बनकर उभरे है।
विनोद सिंह अपनी नर्सरी के बारे मे बात करते हुए  बताते हैं कि 2015 से केले की नर्सरी करना मुझे समझ में आया। इस साल एक हजार स्क्वायर मीटर में केले की नर्सरी तैयार की। मई से जून के बीच नर्सरी तैयार हो जाती है। जुलाई से अगस्त तक के बीच में इसका पौधारोपण शुरू हो जाता है। एक बीघा में एक हजार पौधे लगते हैं। अगर किसानों को सही से ट्रेंनिग मिले तो आज भी खेती घाटे का सौदा नहीं हैं।
केले की नर्सरी लगाने की विधि
सबसे पहले पोली बैग लेते हैं, उसमे मिट्टी और गोबर की खाद आधी-आधी भर देते हैं। जून के पहले सप्ताह में पोलीबैग में मिट्टी और गोबर की खाद भरकर लाइन से क्रमबार रख देते हैं। इसके बाद इसकी सिचाईं कर देते हैं। बावस्टीन, एनपीके19, का समय-समय पर छिड़काव करते रहते हैं।
केले की नर्सरी से मुनाफा
एक लाख पौधों की नर्सरी लगाने में 9-10 लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। एक पौधा 15 रुपए का बिकता है। 25-30 दिनों में नर्सरी से लागत निकाल कर पांच लाख रुपए आसानी से बचाए जा सकते हैं।


आलू की वैज्ञानिक तरीके से उन्नत खेती कैसे करे? Kisan Help Room

गाजर(carrot) की उन्नत खेती कैसे करे?

Share:

Sunday, July 31, 2016

ढाई लाख की नौकरी छोड़ कर शुरू की खेती: आज एक करोड का र्टन ओवर है।




जहॉ एक तरफ किसानों का खेती से मोह भंग होता जा रहा है वही जिले के छोटे से गांव गुराडिया जोगा के एक एमटेक इंजीनियर ने ढाई लाख रुपए की नौकरी छोड़कर खेती को अपनाया है।
23 वर्षीय के कमल पाटीदार का हमेशा अपने गांव की मिट्टी की तरफ ही मन लगा रहा है।
कमल पाटीदार कुछ साल पहले नौकरी छोड़ कर अपने गांव वापस आया है गांव में आकर एक लाख रु कर्ज़ लेकर खेती करनी शुरू थी और धीरे-धीरे सफलता की सीढ़ियां चढता चला गया और आज कमल पाटीदार पूरी तरह से आधुनिक खेती कर रहे है।
उन्होंने अपने ही गांव में श्री जी नामक एक नर्सरी की स्थापना की आस नर्सरी का टर्न अवर 1 करोड रुपए सालाना है।

अब सागवान 20 सालों में नहीं 10 साल में होगा तैयार: किसानों के लिये रहेगा लाभदायक

किसान विनोद सिंह, केले की नर्सरी लगाकर 30 दिन मे कमाते है 5 लाख

कमल पाटीदार में 2011 से पहले चंडीगढ़ से नौकरी छोड़कर साथ बीघा खेत पर अपनी नर्सरी की शुरुआत की थी। शुरू में घर वालों ने उनके नौकरी छोड़ने का विरोध भी किया था, लेकिन कमल ने हार नहीं मानी और इसको एक चैलेंज के रूप में स्वीकार किया। उनका मानना है कि खेती में अगर कुछ नया किया जाए तो अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
कमल पाटीदार द्वारा पूरे क्षेत्र में पहली बार नर्सरी में नेट तकनीकों का प्रयोग किया गया।

किसान गजानंद पटेल आधुनिक खेती से सालाना कमाते हैं करोड़ों

उन्होंने अपनी नर्सरी में सीडलिंग ट्रे और कोकोपिट में 50 हजार पौधे मिर्च, टमाटर, गोभी, बैंगन, खीरा,और करेला आदि के तैयार किये। जब किसानो ने सीडलिंग  ट्रे और कोकोपिट मे तैयार पौधों के परिणाम अच्छे देखे तो यहां से खरीदारी करनी शुरू कर दी । कमल पाटीदार के ग्राहक धीरे-धीरे बढ़ते दे गए तो उनहोने दूसरे साल 5 लाख, तीसरे साल 10 लाख, चौथे साल 20 लाख, और इस वक्त उनहोने 30 लाख पौधे तैयार किए। आज हालात यह है कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के ही नहीं बल्कि कोटा, मंदसौर, रावतभाटा, उज्जैन, शाहजहांपुर तक के किसान कमल की नर्सरी से पौध लेने आते हैं।



वैज्ञानिक तरीके से आलू की उन्नत खेती कैसे करें?

मिर्च की उन्नत खेती करके अधिक लाभ कमाएं किसान भाई

गाजर की उन्नत खेती कैसे करे? Kisan Help Room
Share:

Thursday, July 21, 2016

24 लाख की नौकरी छोड इंजीनियर ने अपनाई खेती: अब साल मे 2 करोड का टर्नअवर:उन्नत किसान सचिन काले

किसान भाईयो आज हम बिलासपुर के रहने वाले सचिन काले ने इंजीनियर के बारे मे बताने जा रहे है जिन्होने पढाई पूरी करके 2003 की नौकरी की शुरुआत नागपुर की एक कंपनी से की।

नागपुर मे नौकरी मिलने के कुछ महीनों बाद ही पुणे की एक कंम्पनी से ऑफर मिलने पर उन्होंने पुणे की वह कंम्पनी ज्वाइन कर ली और वहा नौकरी करने लगे।
 इसी बीच एनटीपीसी सीपत में वैकेंसी निकली सचिन ने एग्जाम क्लियर किया और 2005 में वहां नौकरी करने लगे। 3 साल बाद 2008 में एनटीपीसी की नौकरी छोड़कर पुणे चले गए।
तब उन्हें वहां 12 लाख रुपए सालाना पैकेज मिल रहा था। इसके बाद 2011 में दिल्ली की एक कंपनी ने उन्हें 24 लाख रुपए सालाना पैकेज पर हायर किया।
 सचिन के पास उस वक्त बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर और नामी कंपनी में इंजीनियर की नौकरी थी।
इस कंम्पनी मे 3 साल तक नौकरी करने के बाद नौकरी से उनका मन भर गया और 2014 में वह नौकरी छोड कर अपने घर लौट आए।
घर वापस आने पर उने पिता अशोक काले ने उनसे अपने फैमिली कारोबार आगे बढ़ाने के लिए कहा था, लेकिन सचिन काले ने पिता से कहा कि मै कारोबार करने के लिए गांव नहीं लौटे  हैं।मै खेती करूंगा।

किसान विनोद सिंह, केले की नर्सरी लगाकर 30 दिन मे कमाते है 5 लाख

किसान कम खर्च मे घर पर ही तैयार करे अच्छी किस्म की वर्मी कम्पोस्ट। जाने कैसे?

पिता को सचिन की यह बात थोडी अटपटी लगी, लेकिन वह बेटे से मना नहीं कर सके और सचिन अपने खेतो मे काम करना शुरू करदिया।सचिन की मेढ़पार में करीब 20 एकड़ पुश्तैनी जमीन है।
उन्होंने एक ट्रैक्टर लेकर खुद ही खेत की जुताई शुरू की।और सब्जी की खेती करना शुरू करदिया।
इंजीनियर तो थे ही इसका पूरा फायदा खेतो को फसलो के लिये डिजाईन मे उठाया।
साथ ही आस-पास के किसानों को भी अपने खेत में बुलाकर दिखाया कि कैसे अलग-अलग हिस्सों में कई तरह से सब्जी, भाजी, धान, दाल आदि की खेती की जा सकती है। 
खेती को दिया कॉर्पोरेट का रूप
सचिन काले ने शहर से गांव लाैटते समय ही मन बनालिया था कि खेती को कॉर्पोरेट का रूप देकर ही आगे बढा जासकता है।
इसके लिए उन्होंने इनोवेटिव एग्री लाइफ सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंम्पनी बनाई।
यह कंम्पनी ही इस खेती पर खर्च का इंतजाम करती है अौर उसका हिसाब किताब रखती है, जो इनकम होती है उसमें कंपनी का भी हिस्सा होता है।कंम्पनी और खेती को जोडकर ही सचिन ने नयी ऊँचाईया दी।
सचिन बताते हैं कि पिछले एक साल में उनकी कंपनी का टर्न ओवर दो करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।
आस-पास के 70 गंवो के किसान आते हैं सलाह लेने
इंजीनियर की नौकरी छोड़कर खेती करने की सचिन की चर्चा आस-पास के गांव में फैली तो आस-पास के किसान उनकी फसलो को देखने के लिये आने लगे।

उनके खेतों में खड़े पौधे से कई किसान काफी प्रभावित हुए। उनकी देखादेखी उन्होंने भी अपने खेतों में ऐसी ही फसल ली।
पैदावार अच्छी हुई तो देखते ही देखते 2 साल में उनसे 70 किसान जुड़ गए, जो अब खेती की सलाह लेने आते रहते हैं।
दादा से मिली समाज के लिए काम करने की प्रेरणा
सचिन की उम्र करीब 38 साल है। करीब 12 साल तक उन्होंने नौकरी की जिसमे वह नागपुर, पुणे, दिल्ली, बंबई में रहे।
जब भी वे घर आते थे, तब उनके दादा वसंतराव काले उनसे कहते थे कि नौकरी में कुछ नहीं रखा है। सिर्फ पैसे कमाना ही जिंदगी नहीं है।
उनका कहना था कि समाज के लिए भी उन्हें कुछ करना चाहिए। 
इस बात ने उन्हें इंस्पायर किया और उन्होंने लोगों के लिए ताजी सब्जियां और आर्गेनिक फूड के प्रोडक्ट प्रोड्यूस करने की ठानी।और आज सचिन काले अपने ऐरिया के उन्नत किसान है जो सालाना करोडो कमाते है ।
सचिन काले से प्रेरणा लेकर दूसरे किसान भी सफलता की राह पर चलपडे है बहुत से किसान सचिन से जानकारी लेकर आर्गेनिक खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहे है।


किसान गजानंद पटेल आधुनिक खेती से सालाना कमाते हे 40 लाख: प्रधानमंत्री जी भी कर चुके हे सम्मानित



करेले की उन्नत खेती कैसे करे?किसान करेले की खेती करके लाखो रू़ का लाभ ले सकते है।
Share:

Wednesday, July 20, 2016

किसान गजानंद पटेल आधुनिक खेती से कमाता है 40 लाख रूपये सालाना: प्रधानमन्त्री जी भी कर चुके हे सम्मानित

महासमुंद: एक ऐसा किसान जो कभी पानी की कमी तो कभी पानी की अधिकता से फसलों को मरते तबाह होते देखता रहा ।

लेकिन कभी इस किसान ने हिम्मत नही हारी होसला कई बार टूटा दलाल और मौसम की मार ने कई बार लाखों का नुकसान पहुंचाया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। खेती करने और इसे लाभ का धंधा बनाने की उसकी जिद के आगे कठिनाईया झुक गई और आज वह प्रदेश का नंबर वन तथा उन्नत शील किसान बन गया है। हम जिस किसान की बात कर रहे हैं वह हे महासमुंद जिले के छपोराडीह गांव के 39 वर्षीय किसान गजानंद पटेल की जो आज सिर्फ खेती करके सालाना चालीस लाख रुपए कमाते हैं।
पटेल के पास सिर्फ चार एकड़ ही कृषि भूमि है, जिसमे पहले उन्हें धान की फसल उगाते थे। धान की फसल से उनहे महज 80 हजार रुपए का अधिकतम सालाना लाभ मिलता था।जिसमे घर परिवार को चलाना उनके लिये बहुत ही कठिन था। गजानंद पटेल ने पारम्परिक खेती छोडकर फल और सब्जी की खेती शुरू की, अब फल और सब्जी की खेती से इतनी ही जमीन पर न्यूनतम चालीस लाख की सालाना कमाई हो रही है। गजानंद पटेल पॉलीहाउस खेती करने वाले प्रदेश के पहले किसान हैं। वे कहते हैं, ‘खेती के लिए जीवटता के साथ व्यवसायिक दृष्टिकोण भी जरूरी है।गजानंद पटेल नई-नई वैज्ञानिक तकनीको का प्रयोग करते है।और बताते हे कि नई-नई तकनीकों के प्रयोग से ही किसान उन्नत शील होगा, इसलिए उनहोने खुद भी पॉलीहाउस खेती को अपनाया।
किसान अक्सर मौसम और कीट-पतंगों की मार से फसल को नहीं बचा पाता,अधिक वर्षा तथा ओलावृष्टी मे फसल बर्बाद हो जाती है ऐसे में पॉलीहाउस वरदान साबित हुआ है। मौसम चाहे जो हो, यहां की फसल सौ फीसदी उत्पादन से किसान को लाभ पहुंचाएगी।

जीवामृत अच्छे फसल उत्पादन के साथ ही बढ़ा रहा है भूमि की उर्वराशक्ति। जाने कैसे घर पर ही तैयार करे कम खर्च में

सफेद मूसली की खेती ने किसान को किया मालामाल

दो साल में 25 लाख का नुकसान
गजानंद पटेल को तरबूज ने मुंबई के बाजार में खासी पहचान दिलाई।उनकी तरबूज की इस खेती को देश के कई हिस्सों से किसान यहा देखने पहुंचे। बहुत से दलालों की गिद्ध नजर भी उनकी इस फसल पर पड़ी, दलालो ने अधिक मुनाफा दिलाने के नाम पर साल 2003 में उनहे आठ लाख रुपए चूना लगा दिया। अभी दलालों की मार से उबर भी नहीं पाए थे कि साल 2004 में हुई ओलावृष्टि ने सोलह लाख की फसल को पूरी तरह बरबाद कर दिया। दो साल के भीतर ही पचीस लाख रुपए का नुकसान हुआ, लेकिन उनहोने हार नही मानी, और ना ही फल तथा सब्जी की खेती से मुंह मोड़ा, लगातार अपने होंसले और कडी महनत से आगे बढते रहे सफलता ने उनके कदमो को चूमा और आज गजानंद पटेल एक उन्नत शील किसान हैं।
डेढ़ महीने में 17 लाख का फायदा
गजानंद पटेल ने अपनी बंजर हो रही मैदानी जमीन में खीरा और शिमला मिर्च की खेती करके यह साबित कर दिया है, कि कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। गजानंद ज्यादा पढे लिखे भी नही हे उनहोने महज मिडिल स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त की है, लेकिन आज हार्टीकल्चर डिपार्टमेंट उनके द्वारा तैयार वर्मी कंपोस्ट खाद खरीद रहा है। विभाग की सलाह पर गजानंद ने लिलियम फूल की खेती की और डेढ़ महीने में भोपाल बाजार से 17 लाख रुपए का मुनाफा कमाया। अब झरबेरा फूल की तैयारी शुरू की गई है। जल्द ही इसकी खेती होगी।
प्रधानमंत्री जी भी गजानंद पटेल को कर चुके हैं सम्मानित
फसल परिवर्तन की ऐसी सफलता राज्य में किसी किसान ने हासिल नहीं की, यह राज्य सरकार के साथ कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी मानते हैं। इस सफलता के लिए गजानंद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल समेत कई कृषि वैज्ञानिक समय-समय पर सम्मानित कर चुके हैं। गजानंद सम्मान को आगे बढ़ने का रास्ता मानते हैं। अब उनसे उन्नत बीच तैयार करने का तरीका सीखने कृषि वैज्ञानिक भी गांव पहुंच रहे हैं।
किसानों के लिए प्रेरणा हे गजानंद

एक दशक से फल और सब्जी की खेती में गांव के साथ क्षेत्र को नई पहचान देने वाले किसान गजानंद, दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। छपोराडीह के देवसिंह साहू, सोहनलाल निषाद, झड़ीराम ध्रुव और प्रभुराम दीवान जैसे पचास से अधिक किसानों ने तरबूज की खेती में गजानंद के अनुभवों का लाभ उठाते हुए महानगरीय बाजार में जगह बना ली है। वे कहते हैं कि पटेल ने हमें एक फसली खेती की हताशा भरी जिंदगी से उबारा है, पहले वे कर्ज लेकर खेती करते थे, लेकिन अब इसकी आवश्यकता नहीं है।धीरे-धीरे अब उनके आर्थिक हालात सुधर रहे है।


24 लाख की नौकरी छोडकर इंजीनियर ने अपनाई खेती,अब कमाते हे 2 करोड सालाना:उन्नत किसान सचिन काले

सिर्फ 20 रुपये के वेस्ट डीकम्पोज़र से हो रही है अच्छी खेती

भिंडी की अगेती फसल से किसान कर सकते है अच्छी कमाई। जाने कैसे करे खेती
Share:

Popular Posts

Powered by Blogger.

Featured Post

जैविक खेती आसान और सुरक्षित। किसानों की बढ़ेगी आय।

जैविक खेती जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए हमारा प्रमुख उद्दश्य है जहर मुक्त भोजन और किसानो की आय मे व्रद्धि। जैसा कि हमारे सभी...